Yamuna River| क्या है यमुना नदी का पौराणिक महत्त्व? जानिए यमुना नदी के विषय में हर बात

गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी, यमुना नदी है। यमुना नदी यमुनोत्री नामक स्थान से निकलती है जो कि उत्तरकाशी से 30 किलोमीटर उत्तर, गढ़वाल से आगे बढ़कर प्रयागराज में गंगा नदी से जाकर मिल जाती है। आपको बता दें कि यमुना नदी की मुख्य सहायक नदियों में चम्बल, सेंगर, छोटी सिंध, बेतवा और केन शामिल हैं।

यमुना नदी का उद्गम स्थान हिमालय हिमाच्छदित श्रंग बंदरपुछ से कालिंद पर्वत है, जिसकी ऊंचाई 6200 मीटर से 7 से 8 मील उत्तर पश्चिम की ओर स्थित है। इसी कालिंद पर्वत के नाम पर ही यमुना नदी को कालिंदजा या कालिंदी नाम से भी कहा जाता है।

यमुना नदी अपने उद्गम स्थान से आगे चलकर कई मील तक विशाल अंगारों और हिम कराओ में प्रकट रूप से बहती हुई पहाड़ी ढलान ऊपर से अत्यंत तीव्र उतरती हुई इसकी धारा यमुनोत्री पर्वत से प्रकट होती है। इस स्थान पर इस के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु यात्री हर वर्ष भारतवर्ष के कोने-कोने से पहुंचते हैं।

यमुना नदी का पौराणिक स्रोत

धार्मिक पुराणों के अनुसार भगवान सूर्य नारायण को यमुना नदी का पिता, धर्मराज को इनका भ्राता तथा भगवान श्री कृष्ण कि अष्ट पटरानियों में एक मां कालिंदी भी है। भगवान श्री कृष्ण को ब्रज की संस्कृति का जनक कहा जाता है उसी स्थान पर यमुना नदी को जननी के रूप में माना जाता है।

बृज धाम में मां यमुना को आज भी ब्रजवासी श्याम सुंदर श्री यमुना महारानी कह कर पुकारते हैं तथा वहां बारहों महीने श्री यमुना जी की उनकी पूजा होती है। कार्तिक मास में इसका एक अलग महत्व होता है। कार्तिक मास में बृजवासी यमुना नदी में दीपदान करते हैं संपूर्ण नदी को दीपों से सुसज्जित कर देते हैं। कार्तिक माह में यमुना नदी की शोभा देखते ही बनती है। 

सही अर्थों में कहां जाए तो यमुना नदी ब्रिज वासियों की माता है। अतः इसीलिए बृज मैं उन्हें यमुना मैया कहकर पुकारा जाता है ब्रह्म पुराण के अंतर्गत यमुना नदी के आध्यात्मिक स्वरूप का स्पष्टीकरण करते हुए विवरण प्रस्तुत किया गया है, “जो सृष्टि का आधार है और जिसे लक्षणों से सच्चिदानंद स्वरूप कहा जाता है, उपनिषदों ने जिसका ब्रह्म रूप से गायन किया है वहीं परम तत्व साक्षात यमुना है।”

श्री रूप गोस्वामी जी जो कि गौरी विद्वान है उन्होंने यमुना को साक्षात चिदानंद में बतलाया है। गर्ग संहिता में यमुना के पंचांग में पांच नाम वर्णित हैं, पटल, पद्धति, कवय, स्तोत्र, सहस्त्र।

यमुना नदी का सांस्कृतिक महत्व

प्राचीन नदियों में यमुना नदी की गणना गंगा नदी के साथ ही की जाती है, ये दोनों नदियां भारतवर्ष की सबसे प्राचीन और पवित्र नदियां हैं। आर्यों की पुरातन संस्कृति का गौरवशाली रूप गंगा और यमुना के दो आब की पुण्यभूमि में ही बन सका था। यह दोनों नदियां भारत भूमि की पवित्र, पुरातन तथा सांस्कृतिक हैं। यमुना नदी तो ब्रजमंडल की एकमात्र महत्वपूर्ण नदी है।

ब्रज मंडल में ब्रज संस्कृति के संबंध में यमुना नदी को मात्र एक नदी कहना पर्याप्त नहीं है बल्कि यहां इन्हे भगवान श्री कृष्ण की पटरानी के रूप में देखा जाता है, तथा विधि-विधान से यहां यमुना जी की पूजा की जाती है। यमुना नदी ब्रज की दीर्घकालीन परंपरा की प्रेरक तथा यहां की धार्मिक भावना की प्रमुख आधार मानी गई हैं। बृज भूमि में यमुना नदी का एक विशेष महत्त्व है। 

यमुना नदी के साथ ब्रिज मंडल की कई पुरातन मान्यताएं जुड़ी हुई है। ब्रिज धाम में यमुना नदी सबसे अधिक पूजनीय है तथा ब्रज वासियों को मनोवांछित फल देने वाली कही गई हैं। महान कवियों ने बृज भाषा के जो भक्त कवि और विशेषता वल्लभ संप्रदाय कवियों ने गिरिराज गोवर्धन की भांति मां यमुना के प्रति भी अपनी अतिशय श्रद्धा भक्ति व्यक्त की है।

वृंदावन यमुना की एक ही धारा के तट पर बसा हुआ है वृंदावन में मध्यकाल में अनेक धर्माचार्य और बड़े-बड़े भक्त कवियों ने निवास करके श्रीकृष्ण की उपासना और श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार किया था। वृंदावन में यमुना के किनारे पर बड़े-बड़े सुंदर घाट बने हुए हैं और उन्हीं पर अनेकानेक सुंदर-सुंदर मंदिर देवालय और धर्मशालाएं बनी है। इनसे उस यमुना के तट की शोभा और अधिक कई गुना बढ़ जाती है। 

वृंदावन से आगे चलकर दक्षिण की ओर बहती हुई यमुना नदी मथुरा नगर में प्रवेश करती है। मथुरा में भगवान श्री कृष्ण अवतार धारण किया था जिस वजह से इसके महत्व की वृद्धि हुई मथुरा में भी यमुना नदी के तट पर बड़े ही सुंदर सुंदर घाट बने हुए हैं।

जमुना में नाम से अथवा पुल से देखने पर मथुरा नगर की और वहां के घाटों का मनोरम दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। बीते हुए काल में यमुना नदी मथुरा वृंदावन में एक विशाल नदी के रूप में बहती थी परंतु जब से इससे नैहरे निकाली गई हैं। तब से उसका जली आकार छोटा होता चला गया केवल बरसात के मौसम में ही यमुना नदी अपना पूर्ववर्ती रूप धारण करती हैं उस समय पर मिलो तक इसका पानी फैल जाता है।

यमुना का प्रवाह क्षेत्र

दरअसल यमुना नदी पश्चिमी हिमालय के यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलकर उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा की सीमा के सहारे 95 मील बहकर सफर करती हुई उत्तरी सहारनपुर के मैदानी इलाके में पहुंचती हैं। फिर उसके पश्चात ये नदी दिल्ली, आगरा से होती हुई संगम प्रयागराज में गंगा नदी से जा मिलती है।

ऐतिहासिक काल में यमुना नदी मधुबन के समीप बहती थी जहां उसके तट पर शत्रुघ्न जी ने सर्वप्रथम मथुरा नगरी की स्थापना की थी। श्री वाल्मीकि रामायण और विष्णु पुराण में इसका विवरण प्राप्त होता है। पुराणों से इस बात का ज्ञान होता है की पुराने वृंदावन में यमुना नदी गोवर्धन के निकट बहती थी जबकि वर्तमान समय में यमुना नदी गोवर्धन से लगभग 4 मील दूर हो गई हैं।

वहीं अगर यमुना नदी के आधुनिक प्रवाह क्षेत्र की बात करें तो वर्तमान समय में यमुना नदी सहारनपुर जिले की फैजाबाद मैं गांव के निकट मैदान में आने पर ये उसके आगे 65 मील तक आगे बढ़ती हुई हरियाणा के अंबाला और करनाल जिलों को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और मुजफ्फरनगर जिलों से अलग करती है।

इस भू-भाग में यमुना नदी में मस्कर्रा, कठ, हिंडन और सबी नामक चार नदियां मिलती हैं। जिसके कारण यमुना नदी के आकार में परिवर्तन हो जाता है, इन नदियों के मिलने से इनका जल स्तर और बढ़ जाती है। मैदान में आते ही इससे पूर्वी यमुना नहर और पश्चिमी यमुना नहर निकलती है।

यमुना नदी वेदों के काल से ही गंगा नदी के साथ बहती हैं और गंगा के साथ-साथ यमुना नदी भी हिंदू संस्कृति में पवित्र मानी गई हैं। यमुना नदी उत्तर भारत मैं बहने वाली सबसे लंबी नदियों में से एक है। इस नदी की लंबाई लगभग 1376 किलोमीटर है यह नदी गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी के रूप में मानी जाती है।

यमुना नदी का वर्णन ऋग्वेद में कई स्थानों पर देखने को मिलता है। ऐसा माना जाता है की यमुना नदी का श्याम रंग भगवान शिव के कारण प्राप्त हुआ देवी सती की मृत्यु के पश्चात जब भगवान शिव इस बात का दुख सहन नहीं कर पाए थे और वे इधर-उधर भटक रहे थे तब आखरी में जमुना नदी पर गए तो नदी ने उनका सारा दुख हर लिया जिसकी वजह से नदी का रंग काला हो गया।

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