उत्तराखंड का एक ऐसा अनोखा मंदिर जहां चोरी करने पर होती है मनोकामना पूरी

देवभूमि उत्तराखंड के प्राकृतिक सौंदर्य के विषय में कौन नही जानता है। यहाँ पर प्रकृति की असीम कृपा स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। यहाँ पर स्थित हिमालय और उससे निकली नदियाँ जो पूरे भारत देश को पवित्र करती हैं। यहाँ पर बहुत से पौराणिक काल के प्राचीन मंदिर, गुफ़ायें आदि स्थित हैं।

उत्तराखंड में ही हिन्दुओ के प्रसिध्द चार धाम, पंच प्रयाग, आदि धार्मिक स्थल भी विद्यमान हैं। भारत के देवभूमि उत्तराखंड में एक ऐसा अनोखा मंदिर स्थित है जहां से चोरी करने पर आपके मन की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

उत्तराखंड में रुड़की के चुड़ियाला गांव मे स्थित प्राचीन सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी मंदिर में नवरात्रि के शुभ मौके पर श्रद्धालुओं की बहुत भारी भीड़ यहाँ माता के दर्शनों के लिए एकत्रित होती है। यहाँ माता के इस भव्य मंदिर में सदेव भक्तों का आना जाना लगा रहता है। 

यहाँ के क्षेत्रवासियों के अलावा दूर दूर से श्रद्धालु गण आकर माता के मंदिर में प्रेम और आस्था से उनका मनपसंद प्रसाद हलवा, पूड़ी और चने, बताशा का भोग  चढ़ाकर माता को प्रसन्न कर और उनके दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं। मान्यता के अनुसार यहाँ आने वालों की मनोकामना निःसंदेह ही पूर्ण होती है। मंदिर के पुजारी के अनुसार ये प्राचीन मंदिर सिद्धपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त मंदिर है।

पुत्र प्राप्ति के लिए चुराते हैं लोकड़ा

दरअसल बात ये है कि यहाँ ऐसी मान्यता है कि जो भी पति पत्नी जिनके पुत्र नहीं हैं वे दंपति पुत्र प्रप्ति की इच्छा से इस मंदिर में आकर माता के श्री चरणों से लोकड़ा जोकि लकड़ी का गुड्डा होता है, को चोरी करके अपने साथ ले जाते हैं

और तब तक उसे अपने पास रखते हैं जब तक उन्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हो जाती। पुत्र प्राप्ति के बाद अषाढ़ माह में वे ही दंपति दोबारा यहाँ अपने पुत्र के साथ ढोल नगड़ों सहित मां के दरबार मे आते हैं और जमकर उत्सव मनाते हैं। 

यहाँ आकर वे भंडारा कराते हैं और साथ ही दम्पति ले जाए हुए लोकड़े के साथ ही एक दूसरा लोकड़ा भी लाकर अपने पुत्र के हाथों से माता को चढ़वाते हैं। ये अनोखी प्रथा यहाँ सदियों से चली आ रही है। यहाँ इस गांव की प्रत्येक बेटियां भी विवाह के पश्चात पुत्र प्राप्ति के बाद अपने पुत्र के हांथ से लोकड़ा चढ़वाना नहीं भूलती है।

मंदिर निर्माण की पौराणिक कथा

यहां के बारे में ऐसा कहा जाता है कि माता सती के पिता ब्रह्मा जी के पुत्र राजा प्रजापति दक्ष के द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किए जाने और यज्ञ स्थल पर उनके पिता द्वारा उनके पति के अपमान से क्षुब्ध माता सती ने यज्ञ में कूदकर यज्ञ को विध्वंस कर दिया था। त्रिदेवों में से यदि कोई भी एक किसी शुभकार्य में समिलित नहीं किया गया है तो वो कार्य कभी सिध्द हो ही नहीं सकता है। 

माता सती के आत्मदाह के बाद देवों के महादेव जी जिस समय माता सती के मृत शरीर को उठाकर ले जा रहे थे, उसी समय विष्णु जी के चक्र के द्वारा माता का शरीर कई भागों में विभाजित होकर पृथ्वी पर गिर गया था। माता सती के अंग पृथ्वी पर आकर पिंडों का रूप ले लिया था।

जिनकी स्थापन स्वयं महादेव जी ने अपने हांथ से की थी। इस मान्यता के साथ यहाँ माता की पिंडी स्थापित होने के साथ ही भव्य मंदिर का निर्माण किया गया था।

मंदिर की मान्यता

ये प्राचीन सिद्धपीठ चुड़ामणि मंदिर कालांतर से ही श्रद्धालुओं के मध्य आस्था का बहुत बड़ा केंद्र रहा है। यहां माता के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु भक्तजन बहुत दूर दूर से आते हैं और अपनी इच्छा के अनुरूप वर पाते हैं। नवरात्र के समय मे यहाँ की अलग ही शोभा होती है। नवरात्रि मे यहाँ की महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है। इन दिनों मंदिर में बहुत भव्य और विशाल मेले का आयोजन भी होता है।

मंदिर के पुनर्निर्माण की कथा

यहाँ पास मे गांव के बहुत से निवासी ऐसा वृतांत सुनाते हैं कि एक बार लंढौरा रियासत के राजा यहाँ के जंगल में शिकार करने आते थे। एक बार जंगल में घूमते-घूमते उन्हें माता की पिंडी के दर्शन हुए। राजा के यहां कोई पुत्र नहीं था। राजा ने उसी समय माता से पुत्र प्राप्ति की मनोकामना की।

कुछ समय बाद ही राजा को पुत्र की प्राप्ति हो गयी। पुत्र प्राप्ति के बाद राजा ने सन् 1805 में माता के मंदिर का बहुत ही भव्य निर्माण कराया। देवी के दर्शनों के लिए राजा के संग आयी हुई रानी ने भी माता के शक्ति कुंड की सीढ़ियां बनवाई।

शेर भी रोजाना पिंडी पर टेकते थे मत्था

यहाँ के लोगों का ऐसा कहना है कि जहां पर आज माता का भव्य मंदिर बना हुआ है। वहां पहले घनघोर जंगल हुआ करता था। जहां शेरों की दहाड़ भी सुनाई देती थी। पुराने जानकार ऐसा बताते हैं कि माता की इस जंगल मे माता की पिंडी पर रोज शेर भी आकर मत्था टेक कर जाते थे। फिर उसके बाद यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया गया।

बाबा बण्खंडी का धाम

माता चुड़ामणि के अनन्य भक्त रहे बाबा बण्खंडी का भी समाधि स्थल यहीं मंदिर प्रांगण में ही स्थित है। ऐसा बताया जाता है कि बाबा बण्खंडी माता के महान भक्त एंव संत हुए हैं। इन्होंने माता की पूजा सेवा में ही अपना सम्पुर्ण जीवन व्यतीत कर दिया और अंत में इन्होंने सन् 1909 में माता की भक्ति में लीन होते हुए समाधि ले ली थी।

इस मंदिर के आस पास के स्थान बहुत ही शान्त और सुहावने लगते हैं। यहाँ आप चिड़ियों का चहचहाना स्पष्ट रूप से सुन सकते हैं। यहाँ के जंगलों में आज भी आप को बहुत से सुंदर सुंदर जंगली जानवर और पक्षी देखने को मिलेंगे। यहाँ के मनोरम दृश्य आपका चित्त चुरा लेंगे। माता के दर्शनों और अपनी इच्छापूर्ति के साथ साथ आप यहाँ के मनोरम दृश्य का भी लाभ उठा सकते हैं। 

उत्तराखंड की वादियों के बारे में अधिक कहना ही क्या आप स्वयं वहाँ जा कर देख के आईये तो सही दोबारा न जाने का या वहीं रह जाने का मन न हो जाए तो कहना। वहाँ जाकर आप वहीं के होकर रह जाएंगे।

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