अशोक चक्र उम्मीद सिंह महरा की वीर गाथा

शौर्य और पराक्रम एक साधारण व्यक्ति को भी वीर की उपाधि दिला देता है और बात जब देश की हो तो वो वीर से वीर सैनिक कहलाता है।

भारत माता के वीर सपूत जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी जान तक निछावर करने में कतराते नहीं है। कुछ ऐसे ही थे कैप्टन उम्मेद सिंह महरा जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। साथ ही उनके इसी जोश और जज्बे को सलाम करते हुए उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

कैप्टन उम्मेद का प्रारंभिक जीवन

कैप्टन उम्मेद सिंह महरा भारतीय सेना के एक अधिकारी थे जिन्होंने अपने शौर्य और पराक्रम से दुश्मनों को लोहे के चने चबवा दिए। असल में कैप्टन उम्मेद का जन्म 21 जनवरी, 1942 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में हुआ।

ये एक कुमाऊनी राजपूत परिवार में पैदा हुए थे। आपको बता दें कि 1967 में इन्होंने स्नातक की उपाधि भारतीय सैन्य अकादमी से प्राप्त की।

इसके पश्चात 11 जून को राजपूताना राइफल्स की 19 वीं बटालियन में इनको सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त किया गया। वही 1969 में कैप्टन उम्मेद की पदोन्नति हुई और उन्हें लेफ्टिनेंट बना दिया गया।

घायल होने पर भी दुश्मनों के आगे नहीं झुके

एक नायक के रूप में जाने जाते कैप्टन उम्मेद सिंह महरा का कार्यकाल काफी चुनौतीपूर्ण रहा। इसी बीच 1971 के जुलाई महीने में उन्होंने एक कार्यवाहक कप्तान के रूप में नागालैंड के एक विद्रोही गिरोह के मुख्यालय के खिलाफ एक तरह के छापेमारी दल का नेतृत्व किया।

ऐसा बताया जाता है कि उसी दौरान गोलाबारी में वो घायल हो गए। लेकिन घायल होने के बाद भी इन्होंने ऑपरेशन का नेतृत्व जारी रखा। आपको बता दें कि इसमें हथियारों, महत्वपूर्ण दस्तावेजों और गोला बारुद का एक बड़ा जखीरा था। 

फिर छापे से लौटने पर घावों के बढ़ने से उनकी मृत्यु हो गई। पूरे घटनाक्रम के बाद उन्हें भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन सैन्य अलंकरण यानी अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।

यही नहीं अपनी बहादुरी और साहस की बलबूते पर कैप्टन उम्मेद सिंह महरा कई लोगों के प्रेरणा स्त्रोत हैं। यही कारण है कि भारत ने उन्हें एक सलामी के रूप में ‘अशोक चक्र’ से नवाजा।

कब दिया जाता है अशोक चक्र?

दरअसल 4 जनवरी, 1952 से अशोक चक्र शांति काल में दिया जाने वाला एक सर्वोच्च सैन्य सम्मान है। आपको बता दें कि ये खास सम्मान सैनिकों अथवा सैनिकों को असाधारण वीरता, शौर्यता और बलिदान के लिए प्रदान किया जाता है।

वहीं इसे मृत्यु के पश्चात भी दिया जा सकता है। इसके अलावा अशोक चक्र वीरता के लिए सैनिकों या देश के आम नागरिकों किसी को भी दिया जा सकता है।

असल में युद्ध काल में जिस प्रकार परमवीर चक्र का महत्व है उसी प्रकार शांति काल में अशोक चक्र का महत्व है।

आज की युवा पीढ़ी के लिए उत्तराखंड का ये वीर सपूत एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। यही नहीं कैप्टन उम्मेद का देश के प्रति समर्पण और कर्तव्यनिष्ठता आने वाली कई पीढ़ियों को प्रभावित करती रहेगी। साथ ही संपूर्ण देश उनके पराक्रम और साहस पर निरंतर गर्व करता रहेगा।

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