नरसिंह देवता मंदिर उत्तराखंड | Narsingh Devta Temple Joshimath Uttarakhand

सम्पूर्ण भारत में भगवान नरसिंह (narsingh devta) का उल्लेख होते ही लोगों के मस्तिष्क में भगवान विष्णु के उस अवतार की स्मृति घर करती है जिनका मुख सिंह की भाँति एवं धड़ मनुष्य की भाँति था। भगवान विष्णु के दशावतारों में से चौथे अवतार माने जाने वाले श्री नरसिंह, भक्त प्रहलाद को जीवन दान देने तथा दुष्ट असुरों से उनकी रक्षा करने हेतु हिरण्यकश्यपु का वध करने के लिए, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। ज्योतिर्मठ अर्थात जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में जो मूर्ति है वह भगवान विष्णु के इसी चौथे अवतार की है। 

परंतु आप यह जान कर अचंभित होंगे कि इनका संबंध उत्तराखंड में जागर के रूप में पूजे जाने वाले नरसिंह देवता से नहीं है। उत्तराखंड में नरसिंह भगवान के रूप में भगवान विष्णु के चौथे अवतार को नहीं पूजा जाता ब्लकि एक सिद्ध योगी नरसिंह देवता को पूजा जाता है। उत्तराखंड के जागरों में पूजनीय लोक देवता नरसिंह एक योगी हैं, नाथपंथी साधु। उत्तराखंड क्षेत्र में कई जगह इनके चार एवं कई जगह इनके नौ रूप माने जाते हैं।

इनके चार रूप हैं: दुधिया नरसिंह, कच्या नरसिंह, खरंडा नरसिंह और डौडया नरसिंह। नागा साधुओं की भाँति इनकी लंबी जटायें हैं, और शारीर पर अखंड भभूत लगी रहती है। गढ़वाल में ये चौरासी सिद्धों में भी शामिल हैं। एक कथा के अनुसार एक बार गुरु गोरखनाथ जी केदारनाथ आए और तभी ये नौ भाई उनके शिष्य बन गए। उन्होंने गुरु गोरखनाथ से कई विद्यायें प्राप्त की। एक कथा यह भी है कि इनका जन्म ब्रह्मा जी के दिव्या केसर के फलों से हुआ था। जागर में इनके पिता भस्मासुर को और माता महाकाली को बताया गया है।

Narsingh-Temple-Joshimath-Uttarakhand


भगवान नरसिंह को लगभग पूरे उत्तराखंड में पूजा जाता है एवं इन्हें घर में आला बना कर स्थापित किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार ये नरसिंह देवता एक सिद्ध पुरुष थे जिन्होंने नाथ संप्रदाय के गुरु गोरखनाथ से दीक्षा ग्रहण की थी। कहा जाता है कि इसके सिवा तत्कालीन राजनीति में भी उनका बहुत योगदान और प्रभाव था। उनके सिद्ध एवं सत्पुरुष के कारण प्रजा में उनका बहुत सम्मान था एवं कालांतर में इन्हें देव रूप में पूजा जाने लगा।

उत्तराखंड में नरसिंह देवता की जागर में इनके बावन विरों तथा नौ रूपों का वर्णन किया जाता है, जिसमें नरसिंह देवता को एक योगी के रूप में दर्शाया जाता है। यह सदैव एक झोली, नेपाली चिमटा, तथा टिमरु या तिमुर का डंडा साथ लिए रहते हैं। नरसिंह देवता की पूजा के समय उनके इन्हीं सब प्रतीकों की पूजा की जाती है।

नौ नरसिंह में सबसे अग्रज दुधिया नरसिंह बताए जाते हैं जिनका स्वभाव सबसे शांत एवं दयालु माना जाता है। इनकी पूजा में इन्हें दुग्ध अर्पित कर रोट काटने की परंपरा है। कहा जाता है कि इन्हें दूध से बने भोग अत्यंत प्रिय हैं। इनकी पूजा सात्विक होती है और ये वैष्णव प्रवृत्ति के देवता हैं। सभी नौ भाइयों में सबसे छोटे डौडिया नरसिंह माने जाते हैं। ये बहुत क्रोधी स्वभाव के माने जाते हैं और इन्हें कई जगहों पर नरसिंह भैरों भी कहा जाता है।

इन्हें उग्र देवता के रूप में पूजा जाता है एवं इन्हें रुद्र के गणों में से एक माना जाता है। इनकी पूजा के लिए पूर्व काल में बकरे की बलि दी जाती थी परंतु पशु बलि बंद होने के कारण यह प्रथा रोक दी गई।इनके सात ही कच्या नरसिंह की भी पूजा होती है। ये उग्र देवता घात में जाने वाले देवता हैं। अर्थात जब किसी को न्याय मिलने में परेशानी आती है तब पीड़ित व्यक्ति भगवान का स्मरण कर प्रताड़ित करने वाले व्यक्ति को दण्डित करने का आह्वान करता है, इसे घात कहा जाता है।

इस परिस्थिति में दोनों पक्षों का नुकसान होने की संभावना होती है इसलिए दोनों पक्षों द्वारा इनकी पूजा की जाती है। ध्याणियों अर्थात बहनों के लिए ये देवता बहुत उदार हैं और उनकी पुकार पर उनकी रक्षा हेतु तत्पर रहते हैं। इन देवता का निवास मंदिरों में नहीं ब्लकि घरों में रहता है। उनका रूप मानकर टिमरु के पेड़ का एक डंडा घर में रक्षा के लिए रख लिया जाता है। ये देवता नाथों की बोली बोलते हैं जैसे, “आदेश बाबा”, “आदेश माई”, ये इनके मूल वाक्य हैं।

माना जाता है कि जिसके घर में घात लग जाती है उसके घर पशु दुग्ध देना बंद कर देते हैं, स्वस्थ व्यक्ति बिमार रहने लगते हैं, तथा अन्न भंडार खाली होने लगते हैं। कच्या नरसिंह की पूजा कर उन्हें शान्त करने पर ही इन सभी कष्टों का निवारण होता है। कहा जाता है कि नौ भाई नरसिंह साथ-साथ चलते हैं, और भैरव, मसाण, और अन्य देवी-देवता भी इनके साथ ही चलते हैं।

यह भी कहा जाता है कि नरसिंह देवता के साथ नौ नाग, बारह भैरों, अट्ठारह कलवे, चौसठ जोगिनी, बावन वीर, छप्पन कोट कलिंका की शक्ति चलती है। कहते हैं कि इन्हें चौरासी सिद्धियाँ प्राप्त हैं। जागर कथा के अनुसार नरसिंह देवता भगवान शिव के गणों में शामिल थे। मणि नाथ या मणि भद्र इनके गुरु थे और माँ पार्वती को इनकी मामी बताया जाता है।

कहा जाता है कि नरसिंह देव ने कर्पूरी नरेश से जोशीमठ छीन कर उत्तर भारत में योगियों को एकत्रित कर एक विशाल संगठन की स्थापना की और विदेशी तर्कों के आतंक से प्रजा की रक्षा के लिए राजा सत्ता कायम की। नरसिंह देवता अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न नामों से जाने जाते हैं जैसे, इंग्ला वीर, पिंगला वीर, जती वीर, थती वीर, घोर अघोर वीर, चंड वीर, प्रचंड वीर इत्यादि।

इस गद्य में देव भूमि उत्तराखंड के लोक देवता श्री नरसिंह का भली-भाँति उल्लेख किया गया है। इसे पढ़कर उनके बारे में पर्याप्त जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यह उल्लेख लोक कथाओं से प्रेरित है और विस्तार से उत्तराखंड की नरसिंह देवता को पूजने की परंपरा का वर्णन करता है।

यहां भी पढ़ें:

featured image: ukacademe

Leave a Comment