जानिए त्रियुगीनारायण मंदिर के बारे में | Triyuginarayan Temple

उत्तराखंड राज्य में रुद्रप्रयाग के त्रियुगीनारायण ग्राम में स्थित यह हिन्दू मंदिर समुद्र तल से 6,500 फीट की ऊँचाई पर है। सोनप्रयाग से 5 कि मी दूर, भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित इस भव्य मंदिर का प्राचीन रास्ता गुटठुर से श्री केदारनाथ को जोड़ता है। यह गाँव हिन्दू श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है। स्पष्ट रूप से यह देखा जा सकता है कि केदारनाथ मंदिर में इसी गाँव की स्थापत्य शैली का प्रयोग किया गया है।

किंवदन्ती

पौराणिक कथानुसार प्रख्यात हिमवत की राजधानी त्रियुगीनारायण थी एवं सतयुग में भगवान शिव ने इसी मंदिर में माता पार्वती से विवाह किया था। इस दैवीय विवाह के प्रयोजन में चार कोण वाले हवन कुंड में विशाल अग्नि प्रज्वलित की गई थी। ब्रह्मांड के सभी देवी-देवता एवं साधु-संत इस विवाह के साक्षी थे।

भगवान विष्णु ने विवाह के समय माता पार्वती के भ्राता की भूमिका निभाई थी एवं ब्रह्म देव स्वयं इस विवाह के पुरोहित थे। जिस विपुल अनल के चारों ओर शिव-पार्वती ने सतयुग में सप्त फेरे लिए थे, यह माना जाता है कि वही अखंड लौ आज भी उस हवन कुंड में प्रज्वलित रहती है।

तीन युगों से श्रद्धालुओं का पुज्यस्थल होने के कारण इस मंदिर तथा इस ग्राम को त्रियुगीनारायण नाम दिया गया। मंदिर के समक्ष तीन युगों से प्रज्वलित अखंड अग्नि (धूनी) के कारण इस देवालय को अखंड धूनी मंदिर भी कहा जाता है।

संरचना

मंदिर में कुल चार कुंड स्थित हैं जो देवों द्वारा निर्मित हैं। यहाँ से गुज़रने वाला जल स्त्रोत इन कुंडों में जल की आपूर्ति करता है। मंदिर के प्रांगण में जाते ही सबसे पहले ब्रह्म कुंड दिखाई पड़ता है जहा श्रद्धालु स्नान किया करते हैं। ब्रह्म कुंड के समीप ही रुद्र कुंड स्थित है, यह भी भक्तों के स्नान हेतु निर्मित किया गया था। रुद्र कुंड से आगे बढ़ने पर विष्णु कुंड के दर्शन होते हैं, इस कुंड के जल से आंतरिक शुद्धि के लिए आचमन किया जाता है।

विष्णु कुंड के बिल्कुल बगल में नारद कुंड है जहाँ जौ के आटे के पिंड बनाकर पिंड दान किया जाता है। सबसे ऊपर की ओर स्थित है सरस्वती कुंड जहाँ जौ और तिल के द्वारा पित्र तर्पण किया जाता है। मंदिर के प्रांगण में है महालक्ष्य यज्ञ कुंड जिसका मुख एक पत्थर से ढँका रहता है जो सिर्फ़ यज्ञ के समय की खोला जाता है।

महालक्ष्य यज्ञ कुंड में महायज्ञ होता है जो 108 ब्राह्मणों के द्वारा किया जाने वाला 18 दिनों का यज्ञ है। यह यज्ञ विशेष तिथि और अर्ध शताब्दी के अंतराल में होता है। यह सभी कुंड मंदिर के बाहरी कुंड हैं। मंदिर के भीतर दो और गुप्त कुंड है जिन्हें अमृत कुंड और सूरज कुंड। अमृत कुंड के जल से भगवान को स्नान कराया जाता है और सूरज कुंड के जल से भगवान के लिए भोग तैयार किया जाता है।

मंदिर में प्रवेश करते ही अखंड धूनी के दर्शन होते हैं जिसकी अग्नि ऋषिमुनियों के मन्त्रों द्वारा गौरी-शंकर के विवाह के समय प्रज्वलित की गई थी। इसमें नित्य ही यज्ञ किया जाता है तथा ग्राम वासियों द्वारा निरंतर इस अग्नि को प्रज्वलित रखा जाता है। इस यज्ञ की विभूति की यहाँ का मुख्य प्रसाद माना जाता है।

इस धूनी को प्रज्वलित रखने के लिए गाँव के एक परिवार की ज़िम्मेदारी तीन दिनों तक रहती है। मंदिर के सामने वाले प्रांगण में पंचनाम देवता हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर श्री गणेश तथा मछंदनाथ जी की मूर्तियाँ हैं। मछंदनाथ मंदिर के वीर तथा भगवान गणेश मंदिर के रखवाले माने जाते हैं।

यहाँ माँ अन्नपूर्णा का भी मंदिर है, जिन्हें पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है। इसके सिवा यहाँ ईशानेश्वर भगवान का मंदिर भी है। अखंड धूनी मंदिर की स्थापना के समय ईशान कोण (जो उत्तर पूर्व के बीच की दिशा होती है) में रुद्र देवी की स्थापना की गई थी जिसके कारण इसका नाम ईशानेश्वर महादेव मंदिर पड़ा। इसी प्रांगण में स्थित है अर्धनारीश्वर मंदिर।

अन्नपूर्णा माँ के मंदिर के ऊपर ही हनुमान जी का मंदिर भी है जिसकी बायीं ओर है धूनीसागर। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव का लिंग भस्मी के अंदर है। मंदिर की दूसरी तरफ है धर्मशिला जहाँ तीर्थ पूजन किया जाता है। यदि कोई इस मंदिर में विवाह करता है तो इसी धर्मशिला पर कन्यादान किया जाता है। यही राजा हिमवत ने अपनी पुत्री पार्वती का कन्यादान किया था। पास ही गौ दान करने के लिए गौ बाँधने की खूँटी भी है।

जब शिव-पार्वती का विवाह हुआ था तब इसी खूँटी पर राजा हिमवत ने अपनी पुत्री को सवा सौ लाख गायों का दान किया था। जब कोई भी इस मंदिर में विवाह करता है तो विवाह मंडप यही धर्मशिला पर सजाया जाता है और सप्त फेरे मंदिर के भीतर अखंड धूनी को साक्षी मान कर लिए जाते हैं। मंदिर के अंदर शिव-पार्वती की युगल मूर्ति है जो पत्थर पर उकेरी गई है और प्राचीन काल से यही स्थापित है।

पास ही एक और मूर्ति दिखाई पड़ती है जिसमें भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी शेषनाग पर विराजमान हैं। मंदिर परिसर में ही भोग मंडी है जहाँ भगवान का भोग तैयार किया जाता है। भोग तैयार करने की ज़िम्मेदारी भी ग्राम के प्रत्येक परिवार की होती है। एक परिवार तीन दिनों के लिए भोग बनाने का उत्तरदायित्व निभाता है, तीन दिनों के पश्चात यह ज़िम्मेदारी दूसरे परिवार को दे दी जाती है। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ होने के कारण मंदिर के ऊपर गरुड़ ध्वज है।

मुख्य मंदिर के भीतर बीच में श्री त्रियुगीनारायण जी की मूर्ति है जिसके दाहिनी ओर डोले में माता लक्ष्मी और बायीं ओर माता सरस्वती और पीछे क्षेत्रपाल, कुबेर, मछंदनाथ, बद्रीनारायण, रामचन्द्र, सत्यनारायण, बड़ी चतुर्भुज मूर्ति, और भगवान विष्णु का अखंड दीपक है। चाहे आप भारत के किसी भी राज्य से हैं, अगर आपने पूर्वज यहाँ आए होंगे तो बहीखातों के द्वारा आपको उनकी पूरी जानकारी यहाँ मिल जायेगी।

इस उल्लेख में हमने त्रियुगीनारायण मंदिर (अखंड धूनी मंदिर) का विस्तृत वर्णन की है जिसे पढ़कर यहाँ से संबंधित अधिकतर जानकारी प्राप्त की जा सकती है। परंतु मंदिर और गाँव की वास्तविक सुंदरता का आनंद वहाँ जाकर तथा मंदिर के दर्शन कर के ही उठाया जा सकता है।

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