आखिर क्या है कल्पेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास? जानिए उत्तराखंड की इस धरोहर की गाथा

कल्पेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में स्थित पंच केदारों में पांचवा केदार है।

यहां के सभी मंदिरों के कपाट सर्दियों में छः महीने के लिए बंद कर दिए जाते हैं लेकिन कल्पेश्वर महादेव मंदिर के कपाट अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए पूरे साल खुला रहता है।

इतिहास की अन्य घटनाओं से भी जुड़ा होने के कारण इस कल्पेश्वर महादेव मंदिर का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

कहां स्थित है ये मंदिर

कल्पेश्वर मंदिर बहुत ऊंचाई पर स्थित है। ये मंदिर  समुद्रतल से लगभग 2,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। भगवान शंकर को समर्पित ये स्थान बहुत ही पवित्र माना जाता है। कल्पेश्वर में शिव जी का बहुत ही भव्य मंदिर बना हुआ है।

कल्पेश्वर मंदिर उत्तराखंड के सभी महत्वपूर्ण तीर्थों में से एक है। ये मंदिर प्रकृति के समस्त सौंदर्य को अपने में समाए हुए दिव्य हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य में स्थित है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में महान ऋषि दुर्वासा इस मंदिर में कल्प वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान करते थे। ऐसा भी माना जाता है कि उन्होंने उर्वशी अप्सरा को इसी स्थान पर बनाया था।

यहां का इतिहास

Kalpeshwar Temple ( chamoli )

पौराणिक कथा के अनुसार इस मंदिर का निर्माण महाभारत काल में पांडवों के द्वारा किया गया था। कल्पेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण की कथा के अनुसार जब पांडव महाभारत का युद्ध जीत चुके थे। उसके पश्चात गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने का उपाय जानने हेतु वे कृष्णद्वेपायन श्री वेदव्यास जी के पास गए।

व्यास जी ने पांडवों से कहा कि कुल घाती का कभी कल्याण नहीं होता लेकिन इस पाप से मुक्ति चाहते हो तो केदार जाकर भगवान शिव की पूजा, अर्चना एवं दर्शन करो। व्यास जी से उपदेश ग्रहण कर पांडव भगवान शिव के दर्शन के लिए यात्रा पर निकल पड़े। 

सर्वप्रथम पांडव काशी पहुंचे शिव जी के आशीर्वाद की कामना से परंतु भगवान शिव इस कार्य हेतु इच्छुक नहीं थे क्योंकि शिवजी उनसे बहुत ही क्रोधित थे। पांडव निराश होकर वेदव्यास जी द्वारा निर्देशित केदारखंड की ओर मुड़ गए।

पांडवों को आता देख भगवान शंकर गुप्तकाशी में अंतर्ध्यान हो गए और उसके पश्चात कुछ दूर जाकर दर्शन ना देने की इच्छा से भगवान शिव बैल का भेष बनाकर धरती में समाने लगे। किंतु भीम ने उन्हें देख लिया और पीछे से उन बैल का रूप धरे शिव जी को पकड़ लिया।

इस कारण से बैल का पीछे वाला भाग वहीं रह गया जबकि चार अन्य भाग चार विभिन्न स्थानों पर निकले इन पांच स्थानों पर पांडवों के द्वारा शिवलिंग की स्थापना की गई और शिव मंदिरों का निर्माण कराया गया। इन्हीं मंदिरों को हम पंचकेदार के नाम से जानते हैं।

पंचकेदार

कल्पेश्वर महादेव मंदिर में भगवान शंकर के बैल रूपी अवतार की जटाएं प्रकट हुई थी। बैल का जो भाग भीम ने पकड़ा हुआ था वहां केदारनाथ मंदिर स्थित है। अन्य तीन बचे केदार में मध्यमहेश्वर में नाभि, तुंगनाथ में भुजाएं, व रुद्रनाथ महादेव में मुख आते हैं। कल्पेश्वर मंदिर को पंच केदार में से पांचवां व अंतिम केदार कहा जाता है।

ऐसी मान्यता है कि महर्षि दुर्वासा ने इसी स्थान पर कल्प वृक्ष के नीचे बैठकर बहुत लंबे समय तक घोर तपस्या की थी। तब से इस स्थान को कल्पेश्वर के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में कल्पवृक्ष को बहुत अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसी वृक्ष को भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के कहने पर स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर लेकर आए थे। पृथ्वी पर मनुष्यों के लिए ये कल्प वृक्ष मनचाहा वरदान देने वाला होता है।

एक कथा के अनुसार एक बार देवताओं ने दैत्यों के अत्याचारों से त्रस्त होकर कल्पस्थल में नारायण स्तुति की और भगवान का दर्शन कर अभय का वरदान प्राप्त किया था।

कल्पेश्वर महादेव मंदिर की संरचना बहुत ही अद्भुत है। ये मंदिर देखने में तो बहुत छोटा सा है, परंतु बहुत ही दिव्य है। इस मंदिर में शिवलिंग एक गुफा के भीतर स्थित है, जहां भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है।

भगवान शिव के दर्शन आपको एक गुफा के अंदर लगभग एक किलोमीटर तक पैदल चलने के पश्चात होंगे। यहां भगवान शंकर को जटाधारी या जटेश्वर कहा जाता है यहां ऐसी मान्यता है कि ये शिवलिंग भगवान शिव जी की जटाओं या उलझे हुए बालों का प्रतीक है।

ये शिवलिंग प्राकृतिक है क्योंकि ये भूमि में से प्रकट हुआ था। कल्पेश्वर मंदिर के शिवलिंग को अनादिनाथ कल्पेश्वर के भी नाम से जाना जाता है।

कलेवर कुंड

कल्पेश्वर मंदिर के निकट ही एक पानी का कुंड स्थित है। जिसे यहां कलेवर कुंड के नाम से जाना जाता है। इस कुंड का पानी बिल्कुल साफ और शुद्ध होता है।

ऐसा माना जाता है कि इस कुंड के जल को पीने से बहुत से शारीरिक रोग दूर हो जाते हैं, तन पवित्र और मन निर्मल हो जाता है। इसलिए जो भी श्रद्धालु यहां आते हैं वो इस कलेवर कुंड का जल अवश्य ही पीते हैं। साधु संत इस पवित्र जल का उपयोग भगवान शिव को अर्घ्य देने के लिए करते हैं। 

कल्पगंगा

कल्पेश्वर महादेव मंदिर कल्प गंगा घाटी में स्थित है। कल्प गंगा को पुराने समय में हिरण्यवती के नाम से जाना जाता था। इसके दाहिने स्थान पर स्थित तट की भूमि ‘दुर्वासा भूमि’ कही जाता है। इसी स्थान पर बैठकर दुर्वासा ऋषि ने तपस्या की थी।

यहीं एक स्थान पर ध्यान बद्री का भी मंदिर स्थित है। कल्पेश्वर चट्टान के पाद में एक प्राचीन गुफा है। इस गुफा के गर्भ में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है। कल्पेश्वर चट्टान दिखने में जटा की तरह प्रतीत होती है।

देवग्राम स्थित केदार मंदिर के स्थान पर पहले एक कल्पवृक्ष हुआ करता था। ऐसा कहा जाता है कि यहां पर देवराज इंद्र ने दुर्वासा ऋषि के शाप से मुक्ति पाने के लिए शिवजी की आराधना कर कल्पतरु प्राप्त किया था।

कल्पेश्वर महादेव मंदिर की यात्रा

पुराने समय में कल्पेश्वर मंदिर जाने के लिए लगभग 10 किलोमीटर का ट्रेक करना पड़ता था अर्थात् दुर्गम पहाड़ों पर 10 किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ती थी। ये चढ़ाई हेलंग से शुरू होकर उर्गम व देवग्राम होते हुए कल्पेश्वर मंदिर पहुंचती थी।

वर्तमान समय में सरकार ने देवग्राम तक सड़क की व्यवस्था कर दी है। इसके पश्चात कल्पेश्वर मंदिर की दूरी केवल 300 मीटर ही रह जाती है।

लेकिन शिवलिंग के दर्शन के लिए आपको एक किलोमीटर गुफा के भीतर चलना होगा। इसके बाद आप बिना किसी व्यवधान के कल्पेश्वर महादेव जी की पूजा अर्चना कर सकते हैं।

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