जानिए उत्तराखंड में स्थित गर्तांग गली पुल, नेलांग घाटी और तिब्बत के साथ भारत का व्यापार मार्ग के बारे में

भारत-चीन सीमा के पास उत्तराखंड के जनपद उत्तरकाशी में एक नेलांग घाटी स्थित है। इस घाटी के पास एक गर्तांग गली पुल है। इस पुल का नवीनीकरण के बाद 18 अगस्त, 2021 को 59 साल के बाद ये पर्यटकों के लिए खोला गया है।

ये घाटी अपने भीतर खूबसूरत नजारों के साथ-साथ साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाएं और एक पूरी विरासत को खुद में समेटे हुए है। परंतु पिछले कुछ वर्षों से ये घाटी बिल्कुल सुनसान पड़ी हुई थी।

जिसे अब आखिरकार पर्यटन के लिए खोलने का फैसला लिया गया है। तकरीबन 59 साल के बाद उत्तरकाशी में स्थित इस नेलांग घाटी का खूबसूरत इलाका अब गुलजार होने जा रहा है।

दरअसल आपको बता दें कि खूबसूरती के बीच यहां बसे गांवों का अस्तित्व खत्म सा हो गया है। नेलांग घाटी के जोदांग में सदियों से तिब्बत के साथ व्यापार करने वाली जाड जनजाति को इस स्थान से विस्थापित कर दिया गया था।

क्योंकि ये तिब्बत (चीन) सीमा से लगा हुआ था। सन 1962 में चीन द्वारा भारतीय सीमा पर अतिक्रमण करने के पश्चात इस क्षेत्र को भी संवेदनशील माना गया और यहां के बसे बसाये समाज को बेघर कर दिया गया था।

नेलांग घाटी जाने के लिए जाह्नवी नदी के किनारे से होकर जाना होता है। जाह्नवी नदी, भू वैज्ञानिक स्केल पर भी एक बहुत पुरानी नदी है, इसलिए ये हिमालय को समय के साथ काटती चली गई इससे घाटी और अधिक गहरी बन गई।

इसी रास्ते से जनजातीय जाड़ तिब्बत की ओर यात्रा करते थे और कैलाश यात्रा का भी ये ही पुराना रास्ता था। लेकिन सन 1962 के भारत-चीन युद्ध के पश्चात यहां के हालात बदल गए एवं दोनो के मध्य व्यापार भी बंद हो गया।

जाड जनजाति के व्यापारिक कौशल और अति दुर्गम यात्रा पराक्रम के शिलालेख आज भी इस स्थान पर देखने को मिलते हैं। इसका एक बहुत बड़ा प्रतीक गर्तांग गली है। ये गली कटी चट्टान के बीच एक दरार की तरह है। उस पर लकड़ी की एक बहुत मजबूत रेलिंग भी लगी हुई है।

तिब्बत व्यापार के लिए इस अद्भुत, आश्चर्यजनक, और साहसिक रास्ते का निर्माण जाड जनजाति के द्वारा किया गया था। ये पुल भैरोंघाटी के पास खड़ी चट्टान वाले हिस्से पर लोहे के सब्बल (रॉड) गढ़ाकर के इस अद्भुत रास्ते का निर्माण किया गया था।

Gartang Gali

वर्तमान समय में इस रास्ते को पर्यटन के तौर पर एक नई पहचान मिल रही है। नेलांग घाटी में 59 वर्षों के लंबे इंतजार के पश्चात तिब्बत जाने वाले परंपरागत रास्ते की मरम्मत कर इसे पर्यटन के लिए खोला गया है। भारत और तिब्बत सीमा पर आने जाने वाले पैदल मार्ग गर्तांग गलियारे को काफी समय के बाद खोला जा रहा है।

यहां के स्थानीय लोगों के हिसाब से 17 वीं शताब्दी में यहां के लोगों के साथ पेशावर के पठानों ने मिलकर के समुद्र तल से 11 हजार फीट की ऊंचाई पर जाड़ गंगा घाटी में ग्राम नेलांग, जाढुंग और भोट क्षेत्र के आवागमन के लिए हिमालय की खड़ी पहाड़ी को काटकर दुनिया का सबसे खतरनाक रास्ता बना कर तैयार किया था।

जिसकी प्रेरणा नेलांग ग्राम के निवासी सेठ धनीराम से मिली थी। ये गर्तांग गली लगभग 136 मी लंबा और 1.8 मी चौड़ा लकड़ी से तैयार एक सीढीनुमा मार्ग है। गर्तांग गली भारत और तिब्बत के बीच लिए गए व्यापार का साक्षी रहा।

पिछले कई वर्षों से गर्तांग गली का उपयोग और किसी भी प्रकार की देखभाल ना होने की वजह से इस मार्ग का अस्तित्व मिटता जा रहा था। इस सीमा पर भारत की सुमला, मंडी, नीला पानी, त्रिपानी, पीडीए, और जादुंग अंतिम चौकियां हैं।

सामरिक दृष्टि से संवेदनशील होने के कारण इस क्षेत्र को इनर लाइन क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। इस स्थान पर हर एक कदम पर सेना की कड़ी चौकसी रहती है और बिना अनुमति के किसी को भी कहीं जाने नहीं दिया जाता। यहां बिना अनुमति के जाने पर रोक है।

एक समय ऐसा था जब नेलांग घाटी भारत-तिब्बत के व्यापारियों से गुलजार रहा करती थी। दोरजी (तिब्बत के व्यापारी) ऊन,चमड़े से बने वस्त्र, एवं नमक को लेकर सुमला, मंडी, नेलांग की गर्तांग गली के जरिए ही उत्तरकाशी पहुंचते थे। उस समय पर उत्तरकाशी में एक बड़ा बाजार लगा करता था।

इसी वजह से उत्तरकाशी को बड़ाहाट या बड़ा बाजार भी कहा जाता है। सामान को बेचने के बाद दोरजी यहां से तेल, मसाले, दालें, गुड़, तंबाकू आदि वस्तुओं को ले कर वापस अपने स्थान को जाते थे।

वर्तमान समय में ये  रास्ते ट्रैकिंग लवर्स और एडवेंचरस पसंदीदा लोगों के लिए खास बन गए हैं। ऐसा बताया जाता है कि नेलांग घाटी, लद्दाख घाटी से काफी मिलती जुलती है। परंतु सीमांत क्षेत्र होने की वजह से ये घाटी दुनिया से कटी हुई थी।

फिलहाल अब उत्तराखंड सरकार ने इस गर्तांग घाटी को  आम लोगों के लिए खोल कर स्थानीय पर्यटन की संभावना को और अधिक बढ़ावा दिया है।

इस बेहद खूबसूरत और साहसिक पुल से नेलांग घाटी का रोमांचक दृश्य स्पष्ट दिकह्यी देता है। ये क्षेत्र वनस्पति एवं वन्यजीवियों के हिसाब से बहुत ही समृद्ध है और इस स्थान पर स्नो लेपर्ड व हिमालयन ब्लू शीप जैसे दुर्लब पशु भी रहते हैं।

ये मार्ग सबसे पुराना व्यापारिक मार्ग है। साथ ही गर्तांग गली के ये बेहद संकरा, एडवेंचरस, लेकिन जोखिम भरा रास्ता है। जब से नेलांग घाटी में पर्यटन गतिविधियां शुरू हुई हैं, उसके बाद से ये गर्तांग गली पुल पर्यटकों के लिए आकर्षण का एक बहुत बड़ा केंद्र बना हुआ है।

दूर दूर से लोग यहां इस पुल के देखने व यहां के एडवेंचर का लुत्फ उठाने अधिक मात्रा में आ रहे हैं। अब सरकार ने इसे टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने  निर्णय लिया है।

कुछ भी कहिए उत्तराखंड में मुझे नही लगता की ऐसा कोई छोटा सा भी स्थान है जो घूमने लायक या एडवेंचरस नही है। उत्तराखंड, प्रकृति का एक बहुत बड़ा वरदान है हमारे लिए। ये वो स्थान है जहां प्रकृति ने अपने सभी रंग बिखेरे हैं।

फिर चाहे पहाड़ की बात हो, नदियों की बात हो, घाटियों की बात हो, या रहस्यमयी गुफाओं, मंदिरों की बात हो, उत्तराखंड में हर एक खूबसूरती और दिव्यता समय हुई है। ऐसे स्थान पर भला कौन नहीं जाना चाहेगा?

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