जानिए उत्तराखंड राज्य के भौतिक आधार पर बांटे गए क्षेत्र के विषय में

उत्तरी भारत के विशाल मैदान को गंगा, ब्रह्मपुत्र नदियों का मैदान भी कहा जाता है क्योंकि इस विशाल मैदान का निर्माण प्रायः गंगा, सिंधु एवं ब्रह्मपुत्र नदी तथा इन नदियों की सहायक नदियों द्वारा लाए गए अवसादो के निक्षेपण द्वारा हुआ है। ये विशाल मैदान पश्चिम दिशा में सिंधु नदी से लेकर के पूर्व दिशा में ब्रह्मपुत्र नदी तक फैला हुआ है।

ये मैदान समतल है और इसके उच्चावच में अंतर बहुत ही कम है। ये मैदान पूर्व से पश्चिम तक लगभग 3200 किलोमीटर की लंबाई तक फैला हुआ है तथा इस मैदान की चौड़ाई लगभग 150 से 300 किलोमीटर है। ये विशाल मैदान समुद्र के तल से लगभग 50 से 150 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

साथ ही ये विशाल मैदान कृषि कार्य के लिए बहुत ही उपयोगी है क्योंकि यहां की मिट्टी बहुत ही उपजाऊ है। वहीं यहां पर जलवायु भी उपयुक्त है, एवं फसलों के लिए पर्याप्त जलापूर्ति भी होती है।

उत्तर भारत (उत्तराखंड) के विशाल मैदान को उच्चावच तथा भौतिक लक्षणों के आधार पर विभक्त किया जा सकता है-

▪️भाबर

उत्तरी भारत में शिवालिक श्रेणियों के गिरीपद प्रदेश में सिंधु से तीस्ता नदी तक फैले हुए क्षेत्र को भाबर के नाम से जाना जाता है। भाबर नाम एक स्थानीय लंबी घास यूलाओप्सिस बिनाता से निकला। जिसका उपयोग कागज की रस्सी बनाने के लिए किया जाता है।

वैसे इस क्षेत्र में उगने वाली लंबी घास जिसे भाबर घास या सबइ घास कहते हैं। नैनीताल का अधिकांश भाग भाबर के अंतर्गत आता है। इस भूभाग का निर्माण हिमालय से निकली हुई नदियों के द्वारा लाए गए बजरी, कंकड़, पत्थर आदि के एक ही जगह इकट्ठे होने से हो जाता है। इस मैदान में छोटी छोटी नदियां कंकड़, पत्थर, बजरी के ढेर के नीचे से प्रवाहित होती है। 

यही कारण है कि ये नदियां आगे अदृश्य हो जाती है। अवसादों के हिमालय से उतरते समय निक्षेपण होल से होता है जिन्हें जलोढ़ पंख या जलोढ़ शंकु कहते हैं। पहाड़ों से नीचे उतरती हुई नदियां इस क्षेत्र में आकर विलुप्त हो जाती है। इस मैदान की चौड़ाई लगभग 8 से 10 किलोमीटर की है।

ये क्षेत्र कृषि कार्य के लिए उपयुक्त नहीं है। इसी कारण से यहां कृषि कम ही की जाती है। भाबर एक कंकरीला तथा पारगम्य मैदानी क्षेत्र है। इसी भाबर के दक्षिण में होते हुए जब नदियां धरातल पर आती हैं तो तराई क्षेत्र का निर्माण होता है। ये क्षेत्र वेटलैंड का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

▪️तराई

दरअसल ये मैदान भाबर प्रदेश के सापेक्ष दक्षिण दिशा में स्थित है। ये एक दलदली क्षेत्र है और बारीक कंकड़, पत्थर, चिकनी मिट्टी, कीचड़ तथा बालू आदि से बना हुआ है। भाबर प्रदेश में जो नदियां अदृश्य हो जाती है, वे सभी नदियां तराई क्षेत्र में आकर पुनः धरातल पर पूर्व की भांति बहने लगती है।

प्राचीन में ये क्षेत्र घने वनों से ढका हुआ रहता था लेकिन वर्तमान काल में उनका नवीनीकरण हो गया और ये क्षेत्र अब कृषि भूमि में बदल गया है। इस मैदान की चौड़ाई लगभग 10 से 20 किलोमीटर तक की है। तराई क्षेत्र का पश्चिम दिशा की अपेक्षा पूर्व दिशा में विस्तार अधिक है।

इसका कारण ये है कि पूर्व में वर्षा की अधिकता का होना। इस क्षेत्र में पानी भरा हुआ रहता है क्योंकि यहां ढलान की कमी है। अतः ये तराई क्षेत्र की भूमि का सदैव नाम बना रहता है, एवं कृषि कार्य हेतु उपयुक्त है। यहां मुख्य रूप से चावल, गेहूं, गन्ना आदि की फसलें उगाई जाती हैं।

▪️बांगर

बांगर भूमि का क्षेत्र पुरानी जलोढ़ मिट्टी से निर्मित है। इस मैदान का विस्तार दो नदियों के बीच स्थित दोआब क्षेत्र में पाया जाता है। इनका निर्माण मध्य एवं ऊपरी प्लास्टोसीन काल में हुआ था। ये उत्तरी मैदान की सबसे उच्च भूमि है। इसकी ऊंचाई खादर की तुलना में अधिक होती है।

ये बाल के मैदानों से थोड़ा ऊपर स्थित होते हैं तथा खादर मैदान की तुलना में थोड़े कम उपजाऊ होते हैं। उत्तर भारत के मैदान का सबसे विशाल भाग पुराने जलोढ़ का बना हुआ है, जिसे बांगर कहा जाता है। इस क्षेत्र का विस्तार मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश तथा पंजाब के मैदानी भागो में अधिक है। इस क्षेत्र में भी कंकड़ अधिक पाए जाते हैं। 

सूखे हुए क्षेत्रों में इन मैदानों में छारीय उत्फूलन अधिक  देखने को मिलते हैं। जिन्हें ‘रेह’ या ‘कल्लर’ भी कहा जाता है। इन मैदानों में नदियों के बाढ़ का जल कदापि नहीं पहुंच पाता है, क्योंकि ये सभी क्षेत्र नदियों के बाढ़ वाले मैदान के तल से बहुत ऊपर स्थित है।

साथ ही ये क्षेत्र कृषि कार्य हेतु अधिक उपयोगी नहीं है तथा यहां भूमिगत जल स्तर की गहराई अधिक है। बांगर प्रदेश में अपक्षय के कारण भूमि के ऊपर की मुलायम मिट्टी पूर्णतया नष्ट हो गई है, और उसके स्थान पर अब वहां कंकरीली भूमि मिलती है। इसी कारण ये क्षेत्र कृषि के काबिल नहीं है। इस प्रकार की भूमि को ‘भूड़’ कहा जाता है।

▪️खादर

खादर मैदान का निर्माण नवीन जलोढ़ मिट्टी के द्वारा हुआ है। ये उत्तर भारत के मैदानों की सबसे निचली भूमि है अर्थात इसकी ऊंचाई बांगर मैदान से कम होती है। इस भूमि का विस्तार बिहार, पश्चिम बंगाल तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश तक है। ये सभी प्रदेश खादर क्षेत्र के अंतर्गत ही आते हैं।

इसमें क्षेत्र में कांप मिट्टी भी पाई जाती है। खादर प्रदेश नदियों के निचले हिस्से पर स्थित है। इस क्षेत्र में बाढ़ के समय जलोढ़ की एक नई परत बन जाती है। इस क्षेत्र का भूमिगत जल स्तर काफी ऊंचा है, क्योंकि ये क्षेत्र काफी निचले स्तर पर अवस्थित है। अतः ये क्षेत्र कृषि कार्य हेतु बहुत ही उपयोगी है। यहां की मिट्टी बहुत अधिक उपजाऊ है तथा काम श्रम कराने वाली है।

दरअसल इस मिट्टी में नमी अधिक होने के कारण ये बहुत मुलायम है। लगभग प्रत्येक वर्ष इसकी मिट्टी बदलती रहती है। प्रत्येक वर्ष आने वाली बाढ़ के जल के द्वारा लाए जल और अवसादो के निक्षेपण के कारण इस मैदान का नवीनीकरण होता रहता है। इसी कारण से यह सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र होता है और प्रचुर मात्रा में पैदावार के लिए उपयुक्त है।

खादर भूमि क्षेत्र की मृदा में चीका की अधिकता है। यह ‘चीका’ भूमि को अधिक नमी धारण करने की क्षमता प्रदान करती है। इस क्षेत्र की प्रमुख फसलें हैं, जूट, चावल, गेंहू, गन्ना, दलहन, तिलहन इत्यादि यहां की प्रमुख फसलें हैं।

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