जानिए गढ़वाल के संस्थापक और पहले आत्मनिर्भर शासक महाराजा कनकपाल के बारे में

उत्तराखंड की भूमि पर कई ऐसे राजा हुए जिन्होंने अपने पराक्रम से धरती को सींचा वहीं एक ऐसे भी राजा भी हुए जिन्होंने राज्य को अलग पहचान दिलाई। कुछ ऐसी ही कहानी है गढ़वाल की। दरअसल गढ़वाल राज्य, भारत के उत्तराखंड में पुराने समय में एक राज्य था। ये 1358 ई. में स्थापित एक राजसी राज्य था।

जिस पर 1803 ई. में गोरखाओं द्वारा कब्जा कर लिया गया। एंग्लो नेपाली युद्ध और 1815 की सुगौली की संधि के बाद एक छोटे टिहरी गढ़वाल राज्य के गठन के साथ गढ़वाल राज्य को बहाल कर दिया गया, जोकि 1949 में भारत में सम्मिलित कर लिया गया।

गढ़वाल का इतिहास (History Of Garhwal)

पारंपरिक रूप से इस क्षेत्र का केदारखंड के रूप में कई हिंदू ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। गढ़वाल राज्य, क्षत्रियों का राज था। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास ही कुनिंदा राज्य भी विकसित हुआ।

बाद में ये क्षेत्र कत्यूरी राजाओं के अधीन हो गया, जिन्होंने कत्युर घाटी, बैजनाथ, उत्तराखंड से कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में छठवीं शताब्दी ई. से 11वीं शताब्दी ई. तक राज्य किया, बाद में चंद राजाओं ने कुमाऊं में राज करना शुरू किया, उसी के दौरान गढ़वाल राज्य कई छोटी रियासतों में बंट गया, ह्वेनसांग नामक चीनी यात्री, जिसने 629 ई. के आसपास इस क्षेत्र का दौरा किया था, ने इस क्षेत्र में ब्रह्मपुर नामक राज्य का वर्णन  किया है।

गौरतलब है कि 888 ई. से पहले संपूर्ण गढ़वाल क्षेत्र अलग-अलग स्वतंत्र राजाओं द्वारा शासित छोटे-छोटे गढ़ों में विभक्त था। जिनके शासकों को राणा, राय, ठाकुर कहा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि 823 ई. में जब मालवा के राजकुमार कनकपाल श्री बदरीनाथ जी के दर्शन को आए, वहां उनकी मुलाकात तत्कालीन राजा भानुप्रताप से हुई।

राजा भानुप्रताप ने राजकुमार कनकपाल से प्रभावित होकर अपनी इकलौती पुत्री का विवाह उनके साथ तय कर दिया और अपना सारा राज उन्हें सौंप दिया। धीरे-धीरे कनक पाल एवं उनके वंशजों ने सारे गढ़ों पर विजय प्राप्त कर  साम्राज्य का विस्तार किया। इस प्रकार 1803 तक 915 वर्षों तक स्वास्थ्य गढ़वाल क्षेत्र महाराजा कनकपाल के ही अधीन रहा।

महाराजा कनकपाल (867-918 ई. अनुमानित) Maharaja Kanak Pal Parmara

गढ़वाल में चांदपुरगढ़ के पराक्रमी एवं प्रतापी गढ़पति महाराजा कनकपाल। इतिहासकारों ने कनकपाल को गढ़वाल में 927 वर्षों तक एकछत्र राज करने वाले पवार राजवंश का आदि पुरुष बताया है। परंतु कुछ एक का मत इसके विपरित सुनने को मिलता है। कुछ लेखकों ने कनकपाल को गढ़पति के स्थान पर महाराजा की पदवी से विभूषित किया है।

वहीं ये बात तो बिल्कुल सत्य है कि कनकपाल का गढ़वाल आना, शंकराचार्य का बद्रीधाम में आगमन के बाद हुआ। ये 9 वीं सदी का काल था। उस समय भौना उर्फ भानुप्रताप जगतगढ़ का गढ़पति था। भानुप्रताप चंद्रवंशी क्षत्रिय था। भानुप्रताप का संबंध राजा परीक्षित के वंश से होना सिद्ध होता है।

भानु प्रताप कि केवल दो ही कन्याएं हुईं। वहीं आपको बता दें कि इनमें से एक का विवाह उसने धार (गुजरात) से बद्रीनाथ धाम की यात्रा पर आए 25 वर्षीय युवक कनकपाल से कर दिया। कनकपाल की जाति अविदित है। इतिहासकारों ने उसे पंवारवंशी घोषित कर गढ़वाल के राजवंश का मूल पुरुष मान लिया।

कनक पाल जरूर से ही कत्यूरी साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वतंत्र गढ़पति रहा होगा। कनकपाल ने चांदपुर में एक मजबूत गढ़ी का निर्माण कराया और कई छोटी-छोटी ठाकुराइयों और 64 गढ़पतियों को विजित कर विशाल गढ़वाल राज्य की नींव डाली। अजयपाल गढ़वाल का पहला स्वतंत्र शासक हुआ। कनकपाल के 60 वंशजों ने 888 ई.  से 13 फरवरी, सन 1948 तक गढ़वाल राज्य पर राज किया।

इन 60 राजाओं की नामावली

कनकपाल, श्यामपाल,  पांडुपाल, अभिगतपाल, संगतपाल, रतनपाल, शालिपाल, विधिपाल, मदनपाल, भक्तिपाल, जयचंद्र पाल, पृथ्वीपाल, मदनसिंह पाल, अगस्त पाल, सुरति पाल, जयसिंह पाल, सत्यपाल,  आनंदपाल, विभोग पाल, शुभयान पाल, विक्रम पाल,  विचित्र पाल, हंस पाल, सोनपाल, कांतिपाल, कामदेव पाल, सुलक्षण पाल, सुदक्षण पाल, अनंतपाल, पूर्वदेव पाल, अभयदेव पाल, जयरामदेव पाल, आशलदेव पाल, जगतपाल, जीतपाल, आनंदपाल, अजयपाल,  विजयपाल, सहजपाल, बहादुरशाह, मानशाह, श्यामशाह, महीपति शाह, पृथ्वीपति शाह, मेदनी शाह, फतेहशाह, उपेंद्रशाह, प्रदीप शाह, ललित शाह, जयकृत शाह, प्रद्युम्न शाह, सुदर्शन शाह, भवानी शाह, प्रतापशाह, कीर्तिशाह, नरेंद्रशाह और मानवेंद्र शाह।

इसी के साथ गढ़वाल वंश की स्थापना महाराजा कनकपाल ने की। यही नहीं उन्हें गढ़वाल के संस्थापक और पहले आत्मनिर्भर शासक के रुप में भी जाना जाता है। ज़ाहिर है कि महाराजा कनकपाल ने गढ़वाल वंश को एक अद्भुत पहचान दिलाई जिससे एक राजा की महानता का पता लगाया जा सकता है।

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