Ek Hathiya Deval- भगवान शिव के इस मंदिर में पूजा करने से डरते हैं लोग, जानिए एक हथिया देवाल की मान्यता

भारत भूमि शिव भक्तों और शिव मंदिरों से शोभायमान है। जहाँ हर गली-मोहल्ले में शिव मंदिर मिल ही जाता है , श्रद्धालुओं की भीड़ भोलेनाथ के दर्शन के लिए लालयित रहती है। भगवन शिव तो केवल जल द्वारा अभिषेक करने पर ही प्रसन्न हो जाते है और भक्तों को मनवांछित फल प्रदान करते है।

परन्तु इन सभी भावों के बीच उत्तराखण्ड राज्य की राजधानी देहरादून से 76 किलोमीटर दूर एक गाँव है, जो पिथौरागढ़ जिले से धारचूला जाने वाले मार्ग पर लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस गाँव में एक ऐसा शिवालय है जहाँ कोई पूजा-अर्चना नहीं होती है। इस मंदिर में महादेव के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से भारी तादात में श्रद्धालु-भक्त आते हैं लेकिन पूजन कोई नहीं करता। 

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 76 किलोमीटर दूर एक ग्राम सभा बल्तिर में भगवान शिव का प्रसिद्ध मंदिर एक हथिया देवाल स्थित है। इसे अभिशप्त शिवालय कहा जाता है। माना जाता है कि ये मंदिर एक ही रात में बना है और इसे बनाने वाले कारिगर का एक ही हाथ था।

उसने एक ही हाथ से पूरा मंदिर बनाया है। इसलिए इसे एक हथिया देवाल कहा जाता है। इस मंदिर में भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं पर पूजा कोई नहीं करता। मान्यता है कि जो भी इस शिवलिंग की पूजा करेगा, उसके लिए यह फलदायक नहीं होगी।

एक रात्रि में हुआ था मंदिर निर्माण

उत्तराखंड के चंपावत जिले के हथिया नौला में स्थित भगवान शंकर का यह प्राचीन मंदिर अभिशप्त शिवालय कहा जाता है। इस मंदिर का उल्लेख पुराणों व प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। लोगों का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण-कार्य एक रात में हुआ था तथा जिस कारीगर ने इसे बनाया था उसका सिर्फ एक ही हाथ था। अतः एक ही हाथ से एक ही रात में सम्पूर्ण मंदिर का निर्माण हुआ। यही कारण है कि इस मंदिर को एक हथिया देवाल नाम से जाना जाता है।

चट्टानों को तराश कर बना

यह सम्पूर्ण मंदिर चट्टानों को तराश कर बनाया गया था तथा मंदिर में स्थापित शिवलिंग भी इसी प्रकार निर्मित है। मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा की ओर है। मंदिर में बने मंडप की ऊंचाई 1.85 मीटर और चौड़ाई 3.15 मीटर है। शिवालय का निर्माण कार्य लैटिन शैली व नागर स्थापत्य कला में हुआ है। प्राचीन समय में यहाँ राजा कत्यूरी का शासन था। प्राचीनकाल में राजाओं  को स्थापत्य कला और वास्तुशिल्प से बहुत अधिक लगाव होता था। 

मंदिर निर्माण से सम्बंधित कथा

हथिया नौला के इस गाँव में एक कारीगर था जो साधारणतया चट्टानों को तराश कर मूर्तियाँ बनाया करता था। किसी दुर्घटनावश उसने अपना एक हाथ खो दिया। पर वह मूर्ति बनाने का कार्य नहीं त्यागना चाहता था इसीलिए उसने एक ही हाथ से निर्माण-कार्य करने का सोचा। यह देख गाँव के लोगों ने उसका तिरस्कार करना आरम्भ कर दिया अपने सामर्थ से लोगों को परिचित करा सके इसलिए उसने प्रण किया और अपने औजार लेकर गाँव से दक्षिण दिशा की ओर निकल पड़ा। वहाँ पर एक विशाल चट्टान थी।

अगले दिन सुबह जब ग्रामवासी शौच के उस दिशा में गये तो पाया कि किसी ने रात भर में चट्टान को तराश कर मंदिर बना दिया था। आश्चर्य से सबकी आँखे फटी की फटी रह गयीं। सभी ग्रामवासियों ने उस कारीगर को बहुत ढूंढा पर उसकी कोई जानकारी न मिल सकी।

क्यों नही होता पूजन

जब पंडितों ने शिवलिंग को देखा तो पाया कि जिस कारीगर ने एक रात्रि में इस भव्य शिव मंदिर का निर्माण किया था उसने शिवलिंग का अरघा उत्तर दिशा की ओर बनाने के बजाय दक्षिण दिशा में बना दिया था। बाद में उसे ठीक करने का बहुत प्रयत्न किया गया पर अरघा सीधा न किया जा सका। तब पंडितों ने घोषणा की कि दोषपूर्ण (विपरित अरघा) शिवलिंग का पूजन अमंगलकारी होगा यही कारण है कि आज तक किसी ने भी इस शिवलिंग की पूजा नहीं की।

मंदिर निर्माण से जुड़ी एक अन्य कथा

मंदिर निर्माण की एक अन्य कथा मिलती है जिसके अनुसार, एक बार राजा ने एक कुशल कारीगर का एक हाथ कटवा दिया था ताकि वह कोई अन्य सुन्दर कृति न बना सके। पर उस कारीगर ने एक हाथ से ही अपना कार्य जारी रखा और एक ही रात में एक हाथ से शिव मंदिर का निर्माण किया और हमेशा के लिए राज्य का त्याग करके चला गया।

जब गाँव के लोगों को यह जानकारी मिली तो उन्हें बहुत दुख हुआ। तब उन्होंने यह निर्णय किया कि उनके मन में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा-भाव तो हमेशा ही रहेगी लेकिन राजा के इस कृत्य के विरोध में वे मंदिर में पूजन आदि नहीं करेंगे।

ये एक ऐसा स्थान है जो स्वयं में कई कहानियां समेटे हुए है। यही नहीं ये हर व्यक्ती को अपनी मान्यताओं के चलते सख्ते में डाल देता है। आपको बता दें कि ये शिव मंदिर एक अत्यन्त पवित्र स्थल है जहां कई आलौकिक शक्तियों की अनुभूति होना भी आम सा प्रतीत होता है।

आशा करते है आपको यह ज्ञानवर्धक जानकारी अवश्य पसंद आई होगी। ऐसी ही अन्य धार्मिक और उत्तराखंड संस्कृति से जुड़ी पौराणिक कथाएं पढ़ने के लिए हमें फॉलो करना ना भूलें।

Featured image: amarujala

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