आखिर क्या थी चमोली में आई बाढ़ की असली वजह?

प्राकृतिक आपदाएं अक्सर जनजीवन तहस-नहस कर देती हैं और इसका जीता जागता उदाहरण है। उत्तराखंड के चमोली में आया जल प्रलय।

वर्ष 2021 की 7 फरवरी को चमोली में आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। आपको बता दें कि इस घटना में लगभग 200 लोग लापता हो गए जबकि ऑपरेशन के वक्त करीब 40 शव बरामद हुए।

वही कई तरह के कयास लगाए गए कि आखिर चमोली की धौलीगंगा नदी में आए जल प्रलय का क्या कारण हो सकता है? ये सवाल हर व्यक्ति के मन में उठा जिसने किसी अपने को इस आपदा में खो दिया।

जहां एक तरफ कुदरत के इस कहर को लेकर तरह-तरह के दावे किए गए वहीं दूसरी ओर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (Wadia Institute of Himalayan Geology) के वैज्ञानिकों का प्रारंभिक आंकलन (initial assessment) के अनुसार ये कहना है कि उत्तराखंड में अचानक बाढ़ झूलते ग्लेशियर के ढह जाने की वजह से आई।

आपको बता दें कि झूलता ग्लेशियर (hanging glacier) एक ऐसा हिमखंड होता है जो कि तीव्र ढलान कि एक तरफ से अचानक ही टूट जाता है।

वहीं इसी इंस्टीट्यूट के निदेशक कलाचंद सेन ने बताया कि, “रौंथी ग्लेशियर के समीप एक झूलते ग्लेशियर में ऐसा हुआ, जो रौंथी/मृगुधानी चौकी (समुद्रतल से 6063 मीटर की ऊंचाई पर) से निकला था।”

अनुसंधानकर्ताओं की एक इंटरनेशनल टीम ने रिसर्च द्वारा ये पाया उत्तराखंड के चमोली में 7 फरवरी को जो बाढ़ आई थी वो एक हिमस्खलन का नतीजा था।

आपको बता दें रोंती पर्वत से करीब 2.7 करोड़ क्यूबिक मीटर की चट्टान और उसके साथ हिमनद बर्फ गिरी थी। यही कारण था चमोली जिले में ऐसी भीषण आपदा ने दस्तक दी जिससे कई लोग ना सिर्फ बेघर हुए बल्कि कईयों ने जान तक गंवा दी।

साथ ही लंबे समय तक उत्तराखंड के इस जिले में मौत का तांडव जारी रहा। जिसने भी रेलवे के इस भयानक रूप को देखा वो हैरान रह गया।

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही हैं ऐसी घटनाएं

एक अध्ययन में ये पता चला है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसी घटनाएं अक्सर होती जा रही हैं और ऐसी घटनाएं विकास परियोजनाओं के लिए एक खतरे का निशान है।

शोधकर्ता ने बताया कि हिमस्खलन और चट्टान जल्द ही एक विशाल मलबे में परिवर्तित हो गए। आपको बता दें कि इस अनुसंधान के नतीजों के द्वारा शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं को इस क्षेत्र में आ रहे खतरों को पहचानने में सहायता मिलेगी। इस रिसर्च में उपग्रह से ली गई तस्वीरों भूकंपीय रिकॉर्ड और प्रत्यक्षदर्शियों के वीडियो का इस्तेमाल किया गया।

पर्यावरण की अनदेखी भी है एक बड़ा कारण

  • जिस तरह पर्यावरण के मानदंडों को नजरअंदाज करते हुए पनबिजली से जुड़े बांधों और चौड़ी सड़कों का निर्माण जारी है। निसंदेह ये पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है। इसी वजह से मध्य हिमालय के ऊपर के क्षेत्रों में वन आवरण स्थानीय परिस्थितिकी को लगातार नुकसान हो रहा है जिस पर किसी का ध्यान नहीं है।

  • आपकी जानकारी के लिए बता दें की हाइड्रो पावर भी पूरी तरह से ग्रीन प्रोजेक्ट नहीं है। दरअसल हाइड्रो पावर एक तरह का कम उत्सर्जन वाला ऊर्जा स्त्रोत है लेकिन इसकी डिजाइन की वजह से यह परियोजना पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं है।

  • इसके पीछे का कारण ये है कि विद्युत उत्पादन के लिए कई दफा नदी के प्रवाह को ही मोड़ दिया जाता है। जिस वजह से नदी की परिस्थितिकी पूरी तरह नष्ट हो जाती है। वही जब बांध बनाया जाता है तब ब्लास्टिंग और टनलिंग की वजह से जो झरने पीने के लिए तथा कृषि कार्य के हेतु जल उपलब्ध कराते हैं वो सूख जाते हैं।

  • वही अभी भी उत्तराखंड के ऊपर के भाग, जो गंगा की सहायक कई छोटी-छोटी नदी प्रणालियों का उद्गम क्षेत्र है। इस क्षेत्र में पहले से ही कुल 16 बांध सक्रिय हैं और 1392 से हैं जो निर्माणाधीन है। इससे साफ जाहिर होता है कि कैसे मनुष्य अपने लाभ के लिए प्राकृतिक संपदाओं का शोषण करता है।

आगे की राह ऐसे हो सकती है मजबूत

  • ऐसे कई संवेदनशील क्षेत्र हैं जिनके लिए व्यापक रूपरेखा होना अति आवश्यक है। देखा जाए तो पिछले कुछ समय में हिमालय क्षेत्र में फ्लैश फ्लड की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। तो उसके लिए जरूरी है कि एक मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के साथ-साथ निर्माण और ऐसे इलाकों में खुदाई के लिए एक रूपरेखा निर्मित की जानी चाहिए।

  • साथ ही हाइड्रो पावर विकल्पों कि एक बार पुनर समीक्षा की जानी चाहिए। आपको बता दें कि जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल की एक रिपोर्ट में प्रकाशित हुए आकलन की माने तो जलवायु संकट ने दुनिया भर के पर्वतीय क्षेत्रों में अचानक बाढ़ आने की आवृत्ति और प्रभाव में बढ़ोतरी की है।

  • इसके अलावा एनडीएमए के दिशा निर्देशों का पालन करना भी आवश्यक है। दरअसल राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा निर्देशों के मुताबिक ऐसे किसी भी क्षेत्र में मकान का निर्माण करना निषिद्ध है जो जोखिम भरा हो।

  • आज के समय की यह जरूरत है की हिम्मत जिलों पर शोध किया जाए। बता दे कि उत्तराखंड की लगभग 12000 जिलों में से कितनों से बाढ़ का खतरा है। ये समझने के लिए एक विश्लेषण किया जाना चाहिए। इससे ना सिर्फ महत्वपूर्ण जानकारियां समय पर मिल सकेंगी बल्कि समय पर विकासात्मक परियोजनाओं पर ध्यान दिया जाएगा।

उत्तराखंड के चमोली जिले में मैं आया फ्लैश फ्लड जाहिर करता है कि कई बार मुसीबत आने से पहले उसे आंकना बेहद आवश्यक है अन्यथा परिणाम कई गुना भयानक हो सकते हैं।

जाहिर है भूतकाल मैं हुई घटनाओं में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता परंतु भविष्य को लेकर सचेत जरूर रहा जा सकता है। साथ ही अब वक्त है कि हम पर्यावरण को गंभीरता से लें क्योंकि आज नहीं तो कल, प्रकृति का शोषण हमें भारी पड़ सकता है।

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